(34) और जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सजदा करो, तो उन्होंने सज्दा किया, परन्तु इबलीस ने सजदा न किया। उसने अवज्ञा की और घमण्ड किया और अवज्ञाकारियों में से हो गया। (35) और हमने कहा ऐ आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी दोनों जन्नत (स्वर्ग के बाग़) में रहो और उसमें से खाओ इच्छाभर, जहाँ से चाहो। और उस वृक्ष के निकट मत जाना अन्यथा तुम अत्याचारियों (ज़ालिमों) में से हो जाओगे। (36) फिर शैतान (इबलीस) ने उस वृक्ष के माध्यम से दोनों को विचलित कर दिया और उनको उस आनंदमय जीवन से निकाल दिया जिसमें वह थे। और हमने कहा तुम सब उतरो यहाँ से। तुम एक दूसरे के दुश्मन (शत्रु) होगे। और तुम्हारें लिए पृथ्वी में ठहरना और काम चलाना है एक अवधि तक।
(37) फिर आदम ने सीख लिये अपने पालनहार से कुछ बोल (शब्द) तो अल्लाह ने उस पर दया की। निस्सन्देह वह तौबा (क्षमा-याचना) को स्वीकार करने वाला, दया करने वाला है। (38) फिर हमने कहा तुम सब यहाँ से उतरो। फिर जब आये तुम्हारे पास मेरी ओर से कोई मार्गदर्शन तो जो लोग मेरे मार्गदर्शन का अनुसरण करेंगे, उनके लिए न कोई डर होगा और न वह शोकाकुल होंगे। (39) और जो लोग अवज्ञा करेंगे और हमारी निशानियों को झुठलायेंगे तो वही लोग नरक वाले हैं, वह उसमें सदैव रहेंगे।
(11) और हमने तुमको पैदा किया, फिर हमने तुम्हारा रूप बनाया। फिर फरिश्तों से कहा कि आदम को सजदा करो। अतः उन्होंने सजदा किया। परन्तु इबलीस सजदा करने वालां में सम्मिलित न हुआ। (12) अल्लाह ने कहा कि तुझे किस चीज ने सजदा करने से रोका, जबकि मैने तुझको आदेश दिया था। इबलीस ने कहा कि मैं इससे अच्छा हूँ। तूने मुझको आग से बनाया है और आदम को मिट्टी से। (13) अल्लाह ने कहा कि तू उतर यहाँ से। तुझे यह अधिकार नहीं कि तू इसमें घमण्ड करे। अतः निकल जा निश्चित रूप से तू अपमानित है। (14) इबलीस ने कहा कि उस दिन तक कि लिए तू मुझे अवसर दे जबकि सब लोग उठाये जायेंगे। (15) अल्लाह ने कहा कि तुझको अवसर दिया गया। (16) इबलीस ने कहा चूंकि तूने मुझे भटकाया है, मैं भी लोगों के लिए तेरे सीधे मार्ग पर बैठूँगा। (17) फिर उन पर आऊँगा उनके सामने से और उनके पीछे से और उनके दायें से और उनके बायं से और तू उनमें से अधिकतर को आभार व्यक्त करने वाला न पायेगा। (18) अल्लाह ने कहा कि निकल यहाँ से अपमानित और तिरस्कृत। जो कोई इनमें से तेरे मार्ग पर चलेगा तो मैं तुम सबसे नरक को भर दूंगा।
(19) और ऐ आदम, तुम और तुम्हारी पत्नी जन्नत में रहो और खाओ जहाँ से चाहो परन्तु इस वृक्ष के पास न जाना अन्यथा तुम घाटा उठाने वालों में से हो जाओगे। (20) फिर शैतान ने दोनों को भ्रमित किया ताकि वह खोल दे उनके वह लज्जा के स्थान जो उनसे छिपाये गये थे। उसने उनसे कहा कि तुम्हारे पालनकत्र्ता ने तुमको इस वृक्ष से मात्र इसलिए रोका है कि कहीं तुम दोनों फ़रिश्ता न बन जाओ अथवा तुमको सदैव का जीवन प्राप्त हो जाये। (21) और उसने सौगन्ध खाकर कहा कि मैं तुम दोनों का शुभचिन्तक हूँ।
(22) अतः उसने झुका लिया उनको धोखे से। फिर जब दोनो ने वृक्ष का फल चखा तो उनके लज्जा के स्थान उन पर खुल गये। और वह अपने को बाग़ के पत्तों से ढाँकने लगे और उनके पालनहार ने उनको पुकारा कि क्या मैने तुम्हं इस वृक्ष से मना नहीं किया था और यह नहीं कहा था कि शैतान तुम्हारा प्रत्यक्ष शत्रु है। (23) उन्होने कहा, ऐ हमारे पालनहार, हमने अपने आप पर अत्याचार किया और यदि तू हमको क्षमा न करे और हम पर दया न करे तो हम घाटा उठाने वालों में से हो जायेंगे। (24) अल्लाह ने कहा, उतरो, तुम एक दूसरे के शत्रु रहोगे और तुम्हारे लिए धरती पर एक विशेष अन्तराल तक ठहरना और लाभ उठाना है। (25) अल्लाह ने कहा इसी में तुम जिओगे और इसी में तुम मरोगे और इसी से तुम
निकाले जाओगे।
(19) और ऐ आदम, तुम और तुम्हारी पत्नी जन्नत में रहो और खाओ जहाँ से चाहो परन्तु इस वृक्ष के पास न जाना अन्यथा तुम घाटा उठाने वालों में से हो जाओगे। (20) फिर शैतान ने दोनों को भ्रमित किया ताकि वह खोल दे उनके वह लज्जा के स्थान जो उनसे छिपाये गये थे। उसने उनसे कहा कि तुम्हारे पालनकत्र्ता ने तुमको इस वृक्ष से मात्र इसलिए रोका है कि कहीं तुम दोनों फ़रिश्ता न बन जाओ अथवा तुमको सदैव का जीवन प्राप्त हो जाये। (21) और उसने सौगन्ध खाकर कहा कि मैं तुम दोनों का शुभचिन्तक हूँ।
(22) अतः उसने झुका लिया उनको धोखे से। फिर जब दोनो ने वृक्ष का फल चखा तो उनके लज्जा के स्थान उन पर खुल गये। और वह अपने को बाग़ के पत्तों से ढाँकने लगे और उनके पालनहार ने उनको पुकारा कि क्या मैने तुम्हं इस वृक्ष से मना नहीं किया था और यह नहीं कहा था कि शैतान तुम्हारा प्रत्यक्ष शत्रु है। (23) उन्होने कहा, ऐ हमारे पालनहार, हमने अपने आप पर अत्याचार किया और यदि तू हमको क्षमा न करे और हम पर दया न करे तो हम घाटा उठाने वालों में से हो जायेंगे। (24) अल्लाह ने कहा, उतरो, तुम एक दूसरे के शत्रु रहोगे और तुम्हारे लिए धरती पर एक विशेष अन्तराल तक ठहरना और लाभ उठाना है। (25) अल्लाह ने कहा इसी में तुम जिओगे और इसी में तुम मरोगे और इसी से तुम
निकाले जाओगे।
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(71) जब तुम्हारे पालनहार ने फ़रिश्तों से कहा कि मैं मिट्टी से एक मनुष्य बनाने वाला हूँ। (72) फिर जब मैं उसको ठीक कर लूँ ओर उसमें अपनी आत्मा फूँक दूँ तो तुम उसके आगे सजदे में गिर पड़ना। (73) अतः सभी फ़रिश्तों ने सजदा किया। (74) परन्तु इबलीस कि उसने घमण्ड किया। और वह अवज्ञा करने वालों में से हो गया। (75) फ़रमाया कि ऐ इबलीस, किस चीज़ ने तुझको रोक दियाः कि तू इसको सजदा करे जिसको मैने अपने दोनो हाथो से बनाया। यह तूने घमण्ड किया या तू बड़े दर्जों वालों में से है।
(76) उसने कहा कि मैं आदम से श्रेष्ठ हूँ। तूने मुझको आग से पैदा किया है। और इसको मिट्टी से। (77) फ़रमाया कि तू यहाँ से निकल जा, क्योंकि तू तिरस्कृत है। (78) और तुझ पर मेरा धिक्कार है बदले के दिन तक।
(79) इबलीस ने कहा कि ऐ मेरे पालनहार, मुझको अवकाश दे उस दिन तक के लिए जब लोग पुनः उठाये जायेंगे। (80) फ़रमाया कि तुझको अवकाश दिया गया। (81) निर्धारित समय के लिए। (82) उसने कहा कि तेरे सम्मान की सौगन्ध, मैं उन सबको भटकाकर रहूँगा। (83) सिवाय तेरे उन बन्दों के जिन्हें तूने शुद्ध कर लिया है। (84) फ़रमाया, तो सच्चाई यह है और मैं सत्य ही कहता हूँ। (85) कि मैं नरक को तुझसे और उन समस्त लोगों से भर दूँगा जो उनमें से तेरा अनुसरण करेंगे।
(76) उसने कहा कि मैं आदम से श्रेष्ठ हूँ। तूने मुझको आग से पैदा किया है। और इसको मिट्टी से। (77) फ़रमाया कि तू यहाँ से निकल जा, क्योंकि तू तिरस्कृत है। (78) और तुझ पर मेरा धिक्कार है बदले के दिन तक।
(79) इबलीस ने कहा कि ऐ मेरे पालनहार, मुझको अवकाश दे उस दिन तक के लिए जब लोग पुनः उठाये जायेंगे। (80) फ़रमाया कि तुझको अवकाश दिया गया। (81) निर्धारित समय के लिए। (82) उसने कहा कि तेरे सम्मान की सौगन्ध, मैं उन सबको भटकाकर रहूँगा। (83) सिवाय तेरे उन बन्दों के जिन्हें तूने शुद्ध कर लिया है। (84) फ़रमाया, तो सच्चाई यह है और मैं सत्य ही कहता हूँ। (85) कि मैं नरक को तुझसे और उन समस्त लोगों से भर दूँगा जो उनमें से तेरा अनुसरण करेंगे।
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