* शुरू अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील, अत्यंत दयावान है।
1 कहो कि मुझे वह्य (सन्देश ) की गई है कि जिन्नो के एक समूह ने कुरआन सुना तो उन्होंने कहा कि हमने एक विचित्र कुरान सुना है। 2 जो मार्गदर्शन है तो हम उस पर ईमान लाये और हम अपने पालनहार के साथ किसी को साझीदार न बनायेंगे। 3 और यह कि हमारे पालनहार का गौरव बहुत उच्च है। उसने न कोई पत्नी बनायीं है और न संतान। 4 और यह कि हमारा नासमझ व्यक्ति अल्लाह के सम्बन्ध में बहुत वास्तविकता विरोधी बाते कहता था। 5 और हमने कल्पना की थी कि मनुष्य और जिन्न, अल्लाह के सम्बन्ध में कभी
झूठ बात न कहेंगे। और यह कि मनुष्यों में कुछ ऐसे थे। जो जिन्नों में से कुछ की शरण लेते थे, तो उन्होंने जिन्नों अभिमान और बढ़ा दिया। 7 और यह कि उन्होंने भी कल्पना की, जैसे तुम्हारी कल्पना थी कि अल्लाह किसी को न उठाएगा।
8 और हमने आसमान का निरीक्षण किया तो हमने पाया कि वह कठोर पहरेदारों और उल्काओ से भरा हुआ है। 9 और हम उसके कुछ ठिकानों में सुनने के लिए बैठा करते थे, तो अब जो कोई सुनना चाहता है तो वह अपने लिए एक तैयार उल्का पाता है। 10 और हम नहीं जानते कि यह धरती वालों के लिए कोई बुराई चाही गयी है अथवा उनके पालनहार ने उनके साथ भलाई चाही है। 11 और यह कि हममें कुछ भले हैं और कुछ भिन्न प्रकार के। हम विभिन्न मार्गों पर हैं। 12 और यह कि हमने समझ लिया कि हम धरती में अल्लाह को पराजित नहीं कर सकते। और न भाग कर उसको पराजित कर सकते है। 13 और यह कि हमने जब उपदेश की बात सुनी तो हम उसपर ईमान लाये। तो जो व्यक्ति अपने पालनहार पर ईमान लाएगा तो उसको न किसी कमी का डर होगा और अधिकता का। 14 और यह कि हममें कुछ आज्ञाकारी हैं और हममें कुछ मार्गविहीन हैं, अतः जिसने आज्ञापालन किया तो उन्होंने भलाई का मार्ग ढूँढ लिया। 15 और जो लोग मार्गविहीन हैं तो वह नरक के ईंधन होंगे।
16 और मुझे वह्य (सन्देश) की गई हैं कि यह लोग यदि मार्ग पर अटल हो जाते तो हम इनको बाहुल्यता प्रदान करते। 17 ताकि उसमें उनकी परीक्षा लें, और जो व्यक्ति अपने पालनहार की याद से मुँह मोडेगा तो वह उसको कठोर यातना में दाल देगा। 18 और यह की मस्जिदें अल्लाह के लिए है तो तुम अल्लाह के साथ किसी और को न पुकारो। 19 और यह कि जब अल्लाह का बंदा उसको पुकारने के लिए खड़ा हुआ तो लोग उसपर टूट पड़ने के लिए तैयार हो गए। 20 क्योंकि मैं मात्र अपने पालनहार को पुकारता हूँ और उसके साथ किसी को साझी नहीं करता। 21 कहो कि मैं तुम लोगों के लिए न किसी हानि का अधिकार रखता हूँ और न किसी भलाई का। 22 कहो कि मुझको अल्लाह से कोई बचा नहीं सकता। और न मैं उसके अतिरिक्त कोई शरण पा सकता हूँ। 23 मात्र अल्लाह ही की ओर से पहुँचा देना और उसके संदेशों को अदा कर देना है और जो व्यक्ति अल्लाह और उसके सन्देष्टा की अवज्ञा करेगा तो उसके लिए नरक की आग है। जिसमें वह सदैव रहेंगे।
24 यहाँ तक कि जब वह देखेंगे उस चीज़ को जिसका उनसे वादा किया जा रहा है तो वह जान लेंगे कि किसके सहायक कमजोर है। और कौन संख्या में कम हैं। 25 कहो कि मैं नहीं जानता कि जिस चीज़ का तुमसे वादा किया जा रहा है, वह निकट है या मेरे पालनहार ने उसके लिए लम्बी अवधि निर्धारित कर रखी है। 26 परोक्ष का जानने वाला वही है। वह अपने परोक्ष पर किसी को सूचित नहीं करता। 27 सिवा इस सन्देष्टा के जिसको उसने पसंद किया तो, तो वह उसके आगे और पीछे रक्षक लगा देता है। 28 ताकि अल्लाह जान ले कि उन्होंने अपने पालनहार के सन्देश पहुंचा दिए है और वह उनके वातावरण को घेरे हुए है और उसने हर चीज़ को गिन रखा है।
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अनुवादक-मौलाना वहीदुद्दीन खान
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